By
Maulana Wahiduddin Khan

Soulveda

आत्मनिरीक्षण के माध्यम से आदमी का मन-मस्तिष्क जागरूक होता है, इंसान के व्यक्तित्व में हलचल पैदा होती है। उसके अंदर अपने में सुधार करने की उमंग जागती है। इस तरह आत्मनिरीक्षण इंसान को बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास की ओर ले जाता है।

उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति ने आपके बारे में कोई ऐसी बात कह दी, जो आपको अप्रिय लगी। आपकी भावना भड़क उठी, आपने नकारात्मक प्रतिक्रिया की शैली में उसका उत्तर दिया। कुछ समय बाद आपके अंदर पछतावे (repentance) की भावना पैदा हुई, आपने अपने व्यवहार पर पुनर्विचार किया। आपने सोचा कि इस तरह मैं अपने अंदर एक नकारात्मक व्यक्तित्व बना रहा हूं। ऐसा नकारात्मक व्यक्तित्व मौत के बाद के जीवन में मेरे लिए बहुत ज्यादा हानिकारक सिद्ध होगा। ऐसा नकारात्मक व्यक्तित्व मुझे स्वर्ग में प्रवेश करने के लिए अयोग्य बना देगा।

आपने सोचा कि कुरआन के अनुसार स्वर्ग वालों का व्यवहार शांति वाला व्यवहार होगा। वहां ऐसे लोग बसाए जाएंगे, जो पारस्परिक जीवन में शांति और प्रेम के साथ रहने की योग्यता रखते हों। ऐसी स्थिति में अगर मैंने अपने अंदर ऐसा व्यक्तित्व बनाया, जिसके अंदर सहनशीलता (tolerance) न हो, जो आक्रोशित और उग्र हो जाने वाला हो, जिसके अंदर मित्रतापूर्ण स्वभाव (friendly behaviour) की योग्यता न पाई जाती हो, ऐसा व्यक्ति स्वर्ग में जाने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। वह हमेशा की खुशियों और सफलता से वंचित रहेगा।

यह सोच आपके लिए एक रचनात्मक धमाका सिद्ध होगी। आप खुद अपने आपको जांचने वाले बन जाएंगे। आपके अंदर अपने सुधार की गंभीर मनोवृत्ति पैदा हो जाएगी।

अपने आत्मनिरीक्षण का यह स्वभाव तज़्किये (शुद्धिकरण or self-purification) का सबसे बड़ा माध्यम है। तज़्किया हमेशा आंतरिक सोच के माध्यम से प्राप्त होता है, न कि बाहरी तरह की किसी कार्यवाही के माध्यम से। तज़्किया वह प्रक्रिया है, जिसमें इंसान खुद ही अपने आपको शुद्ध करने वाला बनता है, वह खुद ही शिष्य होता है और खुद ही अपना गुरु भी।

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