भ्रष्टाचार
मुंबई में एक बहुमंज़िला इमारत बनाई गई थी। उसका नाम ‘आकाश दीप’ रखा गया था, मगर जब वह बनकर तैयार हुई, तो अचानक से ढह गई। कहा जाता है कि ढहने की वजह यह थी कि उसकी बनावट में सीमेंट ज़रूरत से कम इस्तेमाल किया गया था।
इस मामले में एक टेक्निकल इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर ने कहा—
“आरसीसी (RCC) कंस्ट्रक्शन एक साइंटिफिक प्रोसेस है, जो क्वालीफाइड और एक्सपीरियंस्ड लोगों के हाथों में बहुत अच्छी होती है, लेकिन अगर इसे नाक़ाबिल (incompetent) इंजीनियरों और ठेकेदारों के हाथों में दे दिया जाए, तो यह ख़तरनाक हो जाती है।”
ऊपर से देखने में यह बात बिलकुल सही और सुंदर लगती है, मगर असलियत यह है कि इसमें एक ग़लतफ़हमी छुपी हुई है। यह ग़लतफ़हमी तब साफ़ दिखने लगती है, जब हम ‘नाक़ाबिल’ की जगह ‘भ्रष्ट’ (corrupt) शब्द का इस्तेमाल करते हैं। असल बात यह है कि हमारे देश में इस तरह की दिक़्क़तें लोगों के लालच और भ्रष्टाचार की वजह से पैदा होती हैं, न कि टेक्निकल जानकारी की कमी की वजह से।
भाखड़ा डैम भारत का सबसे बढ़िया सरकारी प्रोजेक्ट था। इसकी बनावट में देश के सबसे अच्छे इंजीनियर लगाए गए थे, मगर जब वह बनकर तैयार हुआ, तो उसकी दीवार में दरार आ गई, जिसे ठीक करने में करोड़ों रुपये दोबारा लगाने पड़े। इस तरह की घटनाएँ हमारे देश में रोज़ हो रही हैं। ये सारे काम हमेशा टेक्निकल एक्सपर्ट्स की निगरानी में ही होते हैं। इसके बावजूद हालत यह है कि सड़कें बनने के बाद जल्द ही ख़राब हो जाती हैं। इमारतें बनते ही मरम्मत के क़ाबिल हो जाती हैं। प्रोजेक्ट पूरे होने के बाद भी अधूरे लगते हैं। इस तरह की सभी घटनाओं की वजह भ्रष्टाचार है, न कि टेक्निकल कमी।
एक ‘दिमाग़ी बीमारी’ (psychological flaw) है और टेक्निकल कमी एक ‘तकनीकी बीमारी’ (technical flaw) है। दिमाग़ी बीमारी को टेक्निकल ट्रेनिंग से ठीक नहीं किया जा सकता। अगर हम चाहते हैं कि देश में सचमुच एक बेहतर समाज बने, तो हमें देश के लोगों के दिमाग़ को सुधारना होगा। सिर्फ़ टेक्निकल कोर्सेज़ बढ़ाने से यह मक़सद कभी हासिल नहीं हो सकता।
