चरित्र की ताक़त
आम तौर पर लोग दो तरह के इंसानों को ताक़तवर मानते हैं— एक तो वे, जिनके पास दौलत-शोहरत का ढेर हो और दूसरे वे, जो दादागीरी करना जानते हों; लेकिन ताक़त का सबसे बड़ा राज़ है— चरित्र और सबसे ख़ास बात यह है कि चरित्र वह चीज़ है, जो हर इंसान अपना सकता है। इसके लिए न तो दौलत चाहिए, न ही बड़ी-बड़ी मांसपेशी।
मौलाना मुहम्मद क़ासिम क़ासमी (जन्म : 1957) दिल्ली के मदरसा हुसैन बख़्श में टीचर हैं और साथ ही एक मस्जिद में इमाम भी हैं।
उन्होंने दिल्ली में एक घड़ी की मरम्मत की दुकान खोली। दुकान चलाने के लिए उन्हें एक कारीगर की ज़रूरत थी। इसी बीच एक दिन की बात है कि उनकी मस्जिद में एक व्यक्ति नमाज़ पढ़ने आया। उसकी उम्र लगभग 40 साल थी। जब उससे बात हुई, तो पता चला कि उसका नाम मुहम्मद दीन कश्मीरी है और उसे घड़ी ठीक करने का काम आता है।
मौलाना मुहम्मद क़ासिम ने पूछा, “आप दिल्ली कैसे आए?”
मुहम्मद दीन कश्मीरी ने जवाब दिया, “काम की तलाश में।”
“क्या आपको घड़ी ठीक करना आता है?”
“ईश्वर की कृपा है, आता है और मैं अपने काम पर पूरा भरोसा रखता हूँ।”
“क्या दिल्ली में कोई है, जो आपकी ज़मानत ले सकता है?”
“मेरी ज़मानत सिर्फ़ ईश्वर है। अगर आपको ईश्वर की ज़मानत पर भरोसा है, तो मैं वही ज़मानत दे सकता हूँ।”
मुहम्मद दीन कश्मीरी की बातों का यह अंदाज़ सुनकर मौलाना क़ासिम बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने उसे अपनी दुकान पर रख लिया। इस घटना को कई महीने बीत चुके हैं और ईश्वर की दया से दोनों ख़ुश हैं। मौलाना मुहम्मद क़ासिम की दुकान भी चल निकली है और मुहम्मद दीन कश्मीरी को भी रोज़गार मिल गया है।
ऐसी घटनाएँ बताती हैं कि चरित्र में अपनी एक ताक़त होती है। अगर इंसान अच्छे चरित्र का है, तो उसकी यह अच्छाई उसकी बातों में विश्वास और दृढ़ता पैदा कर देती है और जहाँ विश्वास और दृढ़ता आ जाती है, वहाँ कामयाबी उसी तरह आती है, जैसे सूरज के बाद रोशनी और पानी के बाद तृप्ति।
