शिक्षा की अहमियत
शिक्षा सिर्फ़ नौकरी का सर्टिफिकेट नहीं है। इसका असली मक़सद देश के लोगों को जागरूक और समझदार बनाना है। लोगों को जागरूक बनाना एक अच्छा समाज (community) बनाने का पहला क़दम है। समाज का सफ़र जब भी शुरू होगा, यहीं से होगा। यह सफ़र कहीं और से शुरू नहीं हो सकता।
जागरूक बनाने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि समाज के लोग अतीत और वर्तमान को आपस में जोड़ सकें। वे ज़िंदगी की परेशानियों को दुनिया की बड़ी तस्वीर में रखकर देख सकें। वे जान सकें कि वे क्या हैं और क्या नहीं हैं। वे इस राज़ से वाक़िफ़ हों कि वे अपनी मर्ज़ी को ईश्वर की मर्ज़ी के साथ मिलाकर ही दुनिया में कामयाब हो सकते हैं। एक जागरूक इंसान ही असल मायनों में इंसान है। जो जागरूक नहीं है, वह इंसान भी नहीं है।
एक जागरूक इंसान ख़ुद के और दूसरों के बारे में सही राय बनाने के क़ाबिल हो जाता है। वह जान जाता है कि कौन-सी राय पक्षपाती है और कौन-सी निष्पक्ष। जब भी कोई मौक़ा आता है, वह पहचान लेता है कि कौन-सा काम प्रतिक्रिया (reaction) है और कौन-सा सकारात्मक क़दम। वह बुराई को अच्छाई से अलग करता है और झूठ को छोड़कर सच को पहचानता है। हर इंसान के माथे पर एक आँख होती है। शिक्षा इंसान को एक मानसिक आँख देती है। सामान्य आँख इंसान को बाहरी चीज़ें दिखाती है, लेकिन शिक्षा की आँख इंसान को इस लायक़ बनाती है कि वह असली और आध्यात्मिक चीज़ों को देख सके।
जैसे एक किसान बीज से पेड़ बनाता है, वैसे ही एक शिक्षण संस्था का काम है कि वह इंसान को बुद्धिमान बनाए, ताकि वह ज़िंदगी के विकास के सफ़र को पूरा कर सके। शिक्षा इंसान को नौकरी देती है, लेकिन यह शिक्षा का छोटा फ़ायदा है। शिक्षा का असली पहलू यह है कि वह इंसान को ज़िंदगी का विज्ञान सिखाए। वह इंसान को असल मायनों में इंसान बना दे।
