एक सरदार की खूबियाँ
इब्ने सा‘द ने अब्दुल्लाह बिन अब्बास से रिवायत किया है कि मैंने उमर रज़ि० की इतनी ख़िदमत की कि उनके घर वालों में से भी किसी ने उनकी इतनी ख़िदमत नहीं की। वह मुझको अपने पास बिठाते और मेरी इज़्ज़त करते थे। एक दिन मैं उनके घर में तन्हाई में उनके साथ था। अचानक उन्होंने इतने ज़ोर की आह भरी कि मुझे लगा कि उसी के साथ उनकी जान निकल गई। मैंने पूछा, “क्या आपने किसी डर की वजह से आह भरी है” उन्होंने कहा, “हां,” मैंने कहा, “वह डर क्या है?” फ़रमाया, “मेरे क़रीब आ जाओ।” मैं क़रीब हो गया। फिर फ़रमाया, “इस काम (ख़िलाफ़त) के लिए मैं किसी को नहीं पाता।” मैंने छः आदमियों का नाम लेकर कहा, “क्या आपने फ़ुलां और फुलां के बारे में नहीं सोचा?” मैं एक-एक नाम लेता जाता था और वह हरेक के बार में कुछ न कुछ कहते जाते थे। आख़िर में फ़रमायाः
इस काम का अहल (पात्र) सिर्फ़ वही शख़्स है जो शदीद (कठोर) हो बिना अकड़ के। नर्म हो बिना कमज़ोरी के, सख़ी (दानी) हो बिना फ़िजूलखर्ची के, माल रोकने वाला हो बिना कंजूसी के। (कंज़ुल उम्माल, असर संख्या 14262)
अब्दुल्लाह बिन अब्बास ने कहाः “यह अच्छाईयाँ और खूबियां उमर रज़ि० के सिवा किसी और में जमा नहीं हुईं।
