सादा पहचान
अनस बिन मालिक रज़ि अल्लाहु अन्हु कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, “तुम में से कोई सच्चा मुस्लमान नहीं हो सकता जब तक उसका यह हाल न हो जाए कि वह अपने भाई के लिए वही पसंद करे जो वह अपने लिए पसंद करता है। (सही अल-बुखारी, हदीस संख्या 13)।
किसी आदमी के साथ बदजुबानी की जाए, तो उसे बुरा लगेगा और उसके साथ नर्म बोल बोले जाएं तो उसको अच्छा लगेगा। इसी निजी तजुर्बे को सामने रखते हुए वह दूसरों से भी बर्ताव करे। वह दूसरों से कड़वे अन्दाज़ में बात न करे, वह हमेशा उनके साथ नर्म अन्दाज़ में बात करे।
अगर किसी को उसका जायज़ हक़ न मिले, तो वह उसे बुरा लगेगा। इसलिए इंसान को चाहिए कि वह दूसरों के हक़ अदा करे और किसी का हक़ मारने से पूरी तरह बचे।
किसी के साथ वादा किया जाए और फिर उसको पूरा न किया जाए तो उसको बेहद तकलीफ़ पहुंचेगी। आदमी इसी से दूसरों के बारे में सबक़ ले। वह किसी से वादा करे तो ज़रूर उसको पूरा करे, वह किसी के साथ वादाख़िलाफ़ी का व्यवहार न करे।
उसको नुकसान पहुंचाया जाए तो उसको फ़ौरन गुस्सा आ जाता है। इस निजी तजुर्बे को ध्यान में रखते हुए वह दूसरों के बारे में जान ले। वह कभी दूसरों को नुक़सान न पहुंचाए, वह हमेशा यह कोशिश करे कि उससे हमेशा दूसरों को लाभ पहुंचे।
एक सच्चा मुस्लमान बहुत ही हस्सास (संवेदनशील) इन्सान होता है। उसकी संवेदनशीलता उसको मजबूर करती है कि वह दूसरों के हक़ में वैसा ही बने जैसा वह दूसरों को अपने हक़ में देखना चाहता है।
