बुरे बर्ताव से अच्छे नतीजे की उम्मीद करना
ईरानियों से जंग के वक़्त मुसलमानों का एक दल बादशाह यज़्दगर्द के दरबार में पहुँचा। यज़्दगर्द ने उनसे तिरस्कार से बातें कीं। उसने कहा—"मुझे नहीं लगता कि धरती पर तुमसे ज़्यादा बदहाल और आपस में लड़ने वाली कोई क़ौम होगी। हम तुम्हें पास-पड़ोस के गाँवों के हवाले कर देंगे, वही तुम्हारे लिए काफ़ी होंगे।" मुसलमानों की तरफ़ से मुग़ीरा बिन शुअबा ने जवाब दिया—"तुमने हमारी हालत का जो ज़िक्र किया, वह बिल्कुल सही है। हमारे घर बस ज़मीन की सतह पर थे। हम ऊँट और बकरियों के बालों के कपड़े पहनते थे। हमारा हाल यह था कि हम आपस में क़त्ल करते थे, नफ़रत रखते थे। कोई अपनी बेटी को ज़िंदा दफ़ना देता था कि कहीं वह उसके खाने में हिस्सादार न बन जाए। फिर अल्लाह ने हमारे पास एक शख़्स को भेजा, जिसे हम जानते थे और जो हममें सबसे अच्छा था। उसने हमें एक अल्लाह की तरफ़ पुकारा। शुरू में बस एक इंसान (अबू बक्र रज़ि.) ने उसका साथ दिया। हम बाक़ी उसकी बातों को झुठलाते रहे।"
"लेकिन उसने जो कुछ कहा, वह सब सच निकला। फिर अल्लाह ने हमारे दिलों में उसकी सच्चाई बिठा दी और हम उसके मानने वाले बन गए।”
यज़्दगर्द नाराज़ हुआ और बोला—"एक टोकरी मिट्टी लाओ और इसे उनके सबसे बड़े आदमी के सिर पर रख दो और इन्हें भगा दो।" उन्होंने मिट्टी आसिम बिन अम्र के सिर पर रख दी। वह इसे लेकर दरबार से निकले और ऊँटनी पर बैठकर अपने सेनापति सअद बिन अबी वक़्क़ास (रज़ि०) के पास पहुँचे। जब सअद (रज़ि०) को पता चला तो उन्होंने कहा:
"ख़ुश हो जाओ! ख़ुदा की क़सम, अल्लाह ने हमें इनके राज्य की चाबियाँ दे दी हैं। (यानि इसे उनकी ज़मीन जीतने की निशानी समझो)" (अल-बिदाया व अल-निहाया, खंड 7, पृष्ठ. 42)।
