विश्वास और तवक्कुल
पैग़म्बरे इस्लाम (सल्ल०) मक्का में पैदा हुए। आपने अपनी तबलीग़ (इस्लाम का संदेश लोगों तक पहुँचाने) के आरम्भिक बारह साल इसी शहर में गुज़ारे। उस ज़माने में मक्का में शिर्क (बहुदेववाद) को मानने वालों का ज़ोर और बोल-बाला था।
उन्होंने आपको बहुत तकलीफ़ें पहुँचाईं यहां तक कि आपको मार डालने की कोशिशें होने लगीं। जब यह नौबत आ गई तो आप मक्का छोड़ कर मदीना चले गए।
उस समय स्थिति इतनी ख़राब थी कि मक्का से निकल कर सीधे मदीना जाना ख़तरे से खाली न था। इसलिए आप जब मक्का छोड़ कर निकले तो तीन दिन तक आप सौर नामक गुफ़ा में छुपे रहे, जो एक कठिन रास्ते वाले पहाड़ के ऊपर तंग जगह पर स्थित थी। फिर भी आपके दुश्मन आपको खोजते हुए वहां भी पंहुच गए। आप अपने दोस्त अबू बक्र के साथ गुफ़ा में थे और आपके दुश्मन तलवारें लिए हुए गुफ़ा के इतने पास खड़े थे कि आप उनके पैरों को देख सकते थे। मौत आपके बिल्कुल क़रीब पहुंच चुकी थी। हज़रत अबू बक्र यह देख कर बहुत घबराए। उन्होंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से कहा कि वे तो यहां भी आ गए। आपने बहुत इत्मीनान के साथ जवाब दिया, “ऐ अबू बक्र, उन दो के बारे में तुम्हारा क्या विचार है, जिनका तीसरा अल्लाह हो?” (सहीह अल-बुखारी, हदीस संख्या 4663)
यह वाक्य तवक्कुल (अल्लाह पर भरोसा) और विश्वास का सर्वश्रेष्ठ नमूना है। इस वाक्य में इन्सान ‘तवक्कुल’ के सर्वोच्च और अंतिम शिखर पर नज़र आता है।
