एक ही मा’बूद
रसूलुल्लाह (सल्ल०) की वफ़ात 63 साल की उम्र में मदीने में हुई। उस समय लोगों में अजीब दीवानगी छा गई। बहुत से लोगों को यह विश्वास ही नहीं होता था कि आपका इन्तक़ाल हो सकता है या इन्तक़ाल हो गया। हज़रत उमर फ़ारूक़ इस दीवानगी में सबसे आगे थे। वह मदीने की मस्जिद नबवी में तलवार लेकर खड़े हो गए और कहने लगे कि जो शख्स कहेगा कि रसूलल्लाह नहीं रहे मैं इस तलवार से उसकी गरदन उड़ा दूंगा।
मस्जिद नबवी में ज़बर्दस्त तनाव और सन्नाटा था लोग बहुत हठात् और परेशान नज़र आ रहे थे। इतने में हज़रत अबूबक्र वहां आए और उन्होंने इस स्थिति को भांपा और इसके बाद मस्जिद के एक तरफ़ भाषण करने को खड़े हो गए। अपने भाषण में उन्होंने यह ऐतिहासिक वाक्य कहा: “जो शख्स मुहम्मद की इबादत करता था तो मुहम्मद का देहांत हो गया; और जो शख्स अल्लाह की इबादत करता था तो अल्लाह ज़िन्दा है। उस पर कभी मौत आने वाली नहीं।” (सीरत इबन हिशाम, खण्ड 2, पृष्ठ 656)
इस घटना में इंसान ख़ुदा के साथ अपनी बन्दगी के आख़िरी दर्जे पर नज़र आता है। इंसान इंसान है और ख़ुदा ख़ुदा है इस हक़ीक़त को जानना ही सच्चा इल्म है और यह घटना इस सच्चे इल्म की आख़िरी शानदार मिसाल है।
