ख़ुदा का ज़िक्र

क़ैस बिन अबी हाज़िम से रिवायत है कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा (रज़ियल्लाहु अन्हु) अपनी बीवी की गोद में सिर रखे हुए थे कि अचानक वे रोने लगे। उनकी बीवी भी उनके साथ रोने लगीं। उन्होंने पूछा, "तुम क्यों रोईं?" बीवी ने कहा, "मैंने आपको रोते देखा तो मैं भी रोने लगी।"

अब्दुल्लाह बिन रवाहा ने कहा, "मुझे अल्लाह तआला का यह कथन याद आ गया – ‘तुम में से हर एक को जहन्नम से गुज़रना है’ (क़ुरआन, 19:71), तो मुझे नहीं मालूम कि मैं उससे बच सकूंगा या नहीं।" (हयातुस सहाबा, खण्ड 4, पृष्ठ 57)

एक रिवायत के मुताबिक़, उस समय वे बीमार भी थे।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा रसूलुल्लाह (सल्ल०) के सहाबा में से थे। इस महान सहाबी की यह घटना हमें बताती है कि दीन में जिस चीज़ को "ज़िक्र" कहा गया है, वह असल में क्या है।

ज़िक्र केवल ज़ुबान से अल्फ़ाज़ दोहराने का नाम नहीं, बल्कि वह एक अंदरूनी तूफ़ान होता है, जो एक बंदे के दिल में उस वक़्त उठता है जब वह अपने रब को सच्चे दिल से याद करता है।

जो व्यक्ति अल्लाह पर सच्चा ईमान रखता हो, जब वह उसे याद करता है, तो उसकी अज़मत से उसका दिल कांप उठता है, और उसके सामने पेशी का ख़याल उसे हिला देता है। उस वक़्त उसकी दिली हालत ख़ुद-बख़ुद शब्दों के रूप में बाहर निकलने लगती है—यही असली ज़िक्र है।

ख़ुदा का ज़िक्र असल में  ख़ुदा को अपने दिल में उतारने का नाम है—ऐसे अल्लाह को, जिसकी महिमा को पहाड़ भी सहन नहीं कर सकते—उस तूफ़ानी छण में, जो रब्बानी शब्द इंसान की ज़ुबान से निकलते हैं, वही ज़िक्र कहलाते हैं।

ज़िक्र का मक़सद कुछ शब्दों को पा लेना नहीं है, बल्कि ख़ुदा को पा लेना है।

ख़ुदा की याद या उससे दुआ, इंसान और ख़ुदा के बीच संपर्क का ज़रिया है। जब इंसान दिल से पुकारता है, उसी वक़्त ख़ुदा की तरफ़ से उसका जवाब भी आ जाता है।

ह्वेन त्सांग (Hsuan Tsang) एक चीनी बौद्ध साधु था। उसका जन्म 602 ईस्वी में हुआ और 664 में उसका देहांत हुआ। वह 629 ईस्वी में चीन से भारत की यात्रा पर निकला। भारत के बारे में उसका यात्रा विवरण ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत अहम माना जाता है।

एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका के अनुसार, भारत में अपने आख़िरी दिनों में ह्वेन त्सांग के साथ एक हादसा पेश आया। एक यात्रा के दौरान कुछ समुद्री डाकुओं ने उसे पकड़ लिया। ये लोग हिन्दू देवी दुर्गा के पुजारी थे। उन्होंने ह्वेन त्सांग को अपनी देवी के नाम पर बलिदान करने का इरादा किया।

ह्वेन त्सांग ने बहुत विरोध किया। उसने कहा कि वह एक बौद्ध साधु है और केवल सत्य की तलाश में निकला है। लेकिन डाकुओं ने उसकी एक न सुनी। ऐसा प्रतीत होने लगा कि अब उसकी मौत यक़ीनी है।

उस वक़्त वह नाव में सवार था। आख़िर में वह ख़ामोश हो गया और ध्यान व प्रार्थना में लीन हो गया। जब वह पूरी तरह ध्यान और प्रार्थना में मग्न था, समुद्र में एक भयंकर तूफ़ान उठ खड़ा हुआ। लहरों ने नाव को पूरी तरह घेर लिया।

यह दृश्य देखकर डाकू इस क़दर डर गए कि उन्होंने ह्वेन त्सांग को छोड़ दिया और शर्मिंदा होकर उससे माफ़ी माँगने लगे।

जैसा कि वर्णन किया गया है:

"While he was absorbed in meditation, a violent storm arose that buffeted the boat. The pirates were so terrified that they freed the holy monk and asked for forgiveness and repentance." (8/1126)

चीनी यात्री के साथ जो यह वाक़या पेश आया, वह बिल्कुल क़ुरआन के इस बयान के मुताबिक़ है:

"कौन है जो मजबूरी की हालत में पुकारे और (अल्लाह) उसकी मदद न करे और उसकी तकलीफ़ दूर न कर दे?" (नम्ल: 62)

इसमें मोमिन और ग़ैर-मोमिन के बीच कोई फ़र्क नहीं किया गया है। जो भी बंदा किसी नाज़ुक घड़ी में दिल से अपने रब को पुकारेगा, वह उसकी तरफ़ से जवाब पाएगा।

इस तरह की घटनाएँ एक तरफ़ ख़ुदा के वुजूद की ज़िंदा सुबूत हैं, और दूसरी तरफ़ यह भी बताती हैं कि इस दुनिया में इंसान तन्हा नहीं है—उसका एक पासबान (रक्षक) है, जो हर मुश्किल वक़्त में उसकी मदद करता है।

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