एकेश्वरवाद (तौहीद)
हमें सर्वोच्च दर्जा केवल ईश्वर को ही देना चाहिए। अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हमें उसी से माँगना चाहिए। उसी के सामने हमें सिर झुकाना चाहिए और सबसे बढ़कर, उसी पर पूर्ण और निःशर्त भरोसा करना चाहिए।
ईश्वर की एकता पर ईमान लाने का अर्थ यह है कि यह विश्वास किया जाए कि समस्त शक्ति केवल एक ईश्वर के हाथ में है और केवल वही इबादत के योग्य है। इबादत के स्वरूप में किया गया कोई भी कार्य ईश्वर के अतिरिक्त किसी और के लिए जायज़ नहीं है। वही अकेला ईश्वर है जो हमारी सभी आवश्यकताओं को पूरा करता है। वही पूरे ब्रह्मांड की कार्यप्रणाली के पीछे है। सर्वोच्चता केवल एकमात्र ईश्वर का विशेषाधिकार है। इस संसार में किसी और को वास्तविक अर्थों में सर्वोच्चता प्राप्त नहीं है। ईश्वर की प्रभुसत्ता के किसी भी पहलू में किसी को या किसी वस्तु को साझीदार ठहराना एक असत्य और भ्रामक धारणा है।
हमें सच्चे ईश्वर, उस सृष्टिकर्ता के प्रति श्रद्धा और इबादत प्रकट करनी चाहिए, जो वास्तव में इसके योग्य है। इसके विपरीत, जब मनुष्य किसी और के सामने सिर झुकाता है, तो वह उसे ऊँचा स्थान दे देता है जो स्वयं उससे बेहतर नहीं है, और इस प्रकार उसे इबादत के योग्य मान लेता है, जबकि वह इसके योग्य नहीं होता। ईश्वर की इबादत उसकी महानता को प्रकट करती है, जबकि ईश्वर के अलावा किसी और की इबादत करना स्वयं इबादत करने वाले को छोटा और अपमानित कर देता है। ईश्वर की इबादत मनुष्य को यथार्थवादी बनाती है, जबकि किसी ग़ैर-ईश्वर के सामने झुकना उसे अंधविश्वास का शिकार बना देता है। ईश्वर के सामने झुकना सत्य को पहचानने का द्वार खोलता है, जबकि ईश्वर के सिवा किसी और की इबादत करना इस द्वार को बंद कर देता है।
हमें सर्वोच्च दर्जा केवल एकमात्र ईश्वर को ही देना चाहिए। हमें अपनी ज़रूरतों के लिए उसी से माँगना चाहिए। उसी का आज्ञाकारी बनना चाहिए। उसी पर पूर्ण भरोसा करना चाहिए, और हर दृष्टि से सर्वोच्चता का स्थान केवल उसी के लिए सुरक्षित रखना चाहिए। इबादत किसी भी संबंध की अंतिम और सर्वोच्च अवस्था है, इसलिए उसका केंद्र केवल ईश्वर ही हो सकता है। इसी कारण किसी भी प्रकार का आदर, श्रद्धा या भक्ति-भाव केवल ईश्वर के लिए ही जायज़ है।
जब कोई मनुष्य ईश्वर को अपनी आराधना का केंद्र बनाता है, तो वह एक ऐसी हस्ती के सामने झुकता है जो हक़ीक़त में मौजूद है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति किसी ग़ैर-ईश्वर को अपनी इबादत का विषय बनाता है, वह ऐसी वस्तु के सामने झुकता है, जिसका वास्तविक अस्तित्व नहीं है, भले ही उसने अपने तथाकथित ‘ईश्वर’ की कोई भौतिक प्रतिमा बना रखी हो। पहले मामले में मनुष्य ने शक्ति के एक सच्चे और भरोसेमंद स्रोत को पा लिया होता है, जबकि दूसरे मामले में वह घोर अंधविश्वास से जुड़ जाता है, जिसका तर्क और वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता। ईश्वर के उपासकों को शाश्वत कृपा और आशीर्वाद (नेमतें) प्राप्त होते हैं; जबकि ईश्वर के अलावा अन्य चीज़ों की पूजा करने वालों के हिस्से में स्थायी अभाव और वंचित रहने के सिवा कुछ नहीं आता।
