ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव
हमें अपनी दृष्टि को ऐसा बनाना चाहिए कि हम उसकी सृष्टि में उसकी महानता को पहचान सकें। तब हम हर क्षण ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव कर सकेंगे।
1972 में अपोलो-15 अंतरिक्ष यान से चाँद की यात्रा करने वाले तीन लोगों में एक व्यक्ति कर्नल जेम्स इरविन था। एक साक्षात्कार में उसने कहा कि चाँद पर क़दम रखना उसके लिए एक अद्भुत अनुभव था। उसने कहा कि उसने वहाँ ईश्वर की उपस्थिति को महसूस किया। वह अत्यंत उल्लास से भर गया था और अपने अंतर्मन में कुछ बहुत गहरा अनुभव कर रहा था। उसने कहा कि वह अपनी आँखों से ईश्वर की महिमा को देख पा रहा था। उसके लिए, उसने स्पष्ट किया, चाँद की यह यात्रा केवल एक वैज्ञानिक अभियान नहीं थी, बल्कि उसने उसे एक आध्यात्मिक जीवन का भी उपहार दिया।
कर्नल इरविन का यह अनुभव किसी भी तरह से असामान्य नहीं था। वास्तव में, ईश्वर की बनाई हुई हर चीज़ इतनी आश्चर्यजनक है कि उसे देखकर और यह सोचकर कि इसका रचयिता कितना महान होगा, इंसान विस्मय से भर जाता है। सृष्टि की पूर्णता में हर क्षण ईश्वर की महानता दिखाई देती है। लेकिन बचपन से ही अपने चारों ओर की दुनिया को देखते-देखते हम इसके इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि इसकी विशिष्टता को महसूस नहीं कर पाते। हवा, पानी, पेड़, पक्षी—दुनिया में जो कुछ भी मौजूद है, वह सब अत्यंत अद्भुत है। सृष्टि की हर एक वस्तु अपने रचयिता का दर्पण है। किंतु हम इनके इतने आदी हो गए हैं कि हमें उनकी अद्भुतता का एहसास ही नहीं होता। लेकिन जब कोई व्यक्ति पहली बार चाँद पर क़दम रखता है और ईश्वर की इस सृष्टि को नए सिरे से देखता है, तो वह ईश्वर की “उपस्थिति” को महसूस किए बिना नहीं रह सकता। वह सृष्टि की कार्यप्रणाली में रचयिता को प्रतिबिंबित होता हुआ देखता है।
हम भी जिस दुनिया में रहते हैं, उसमें ईश्वर की उपस्थिति को उसी तरह अनुभव कर सकते हैं, जैसे कर्नल इरविन ने चाँद पर उतरते समय किया था। लेकिन लोग इस दुनिया को उस विस्मय और आश्चर्य की दृष्टि से नहीं देखते, जिस दृष्टि से कोई व्यक्ति पहली बार चाँद को देखता है। यदि हम अपनी दुनिया को भी उसी दृष्टि से देखने लगें, तो हम हर क्षण ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने लगेंगे। तब हम ऐसे जीने लगेंगे, मानो हम ईश्वर की पड़ोस में रह रहे हों और वह हर पल हमारी आँखों के सामने मौजूद हो।
जब हम पहली बार किसी उच्च-स्तरीय मशीन को देखते हैं, तो तुरंत हमें वहाँ किसी कुशल इंजीनियर की उपस्थिति का आभास होता है। उसी प्रकार, यदि हम दुनिया और उसमें मौजूद हर चीज़ को गहराई से देखने लगें, तो उसी क्षण हमें ईश्वर की “उपस्थिति” का अनुभव होगा। रचयिता हमारे सामने इस तरह प्रकट होगा कि हम सृष्टि (creation) और सृष्टि-निर्माता (Creator) को अलग-अलग नहीं कर पाएँगे।
इस संसार में किसी व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वह ईश्वर को देखने लगे, ईश्वर की निकटता को महसूस करने लगे। यदि वह वास्तव में जीवित दिल रखता है, तो वह सूर्य की तेज़ किरणों में ईश्वर का नूर देखेगा। वह हरे-भरे वृक्षों में ईश्वर के प्रतिबिंब को पहचानेगा। वह नरम हवाओं के स्पर्श में ईश्वर की मौजूदगी को महसूस करेगा। फिर जब वह सज्दा करेगा और अपनी हथेलियाँ तथा माथा ज़मीन पर रखेगा, तो वह अपने पूरे अस्तित्व को अपने रब के चरणों में समर्पित करने का अनुभव करेगा।
ईश्वर को उसकी सृष्टि में हर जगह देखा जा सकता है। इसलिए हमें ऐसी आँखें प्राप्त करनी चाहिए, जो ईश्वर को उसकी सृष्टि में देख सकें। तब हम हर क्षण ईश्वर की उपस्थिति को महसूस कर सकेंगे।
