मनुष्य के लिए ईश्वर की योजना

मनुष्य को वर्तमान संसार में परीक्षा के लिए रखा गया है। उसके कर्मों के रिकॉर्ड के आधार पर ही यह तय होगा कि वह शाश्वत जन्नत में सुखपूर्वक रहेगा या फिर पूर्ण अभाव और महरूमी में डाला जाएगा।

हमारे सामने जो ब्रह्मांड विद्यमान है, वह इतना विशाल और महान है कि उसके सामने बाकी सारी चीज़ें तुच्छ प्रतीत होती हैं। इसलिए जब ब्रह्मांड जैसी महान रचना अस्तित्व में आ सकती है, तो उससे छोटी और कम महत्व की बातें क्यों अस्तित्व में नहीं आ सकतीं? इसी संदर्भ में क़ुरआन द्वारा दी गई यह सूचना कि मनुष्य को फिर से जीवित किया जाएगा, पहले से ही इस विशाल सृष्टि के उदाहरणों द्वारा समझ में आने योग्य बन जाती है।

मनुष्य का जीवन दो चरणों में फैला हुआ है—एक इस संसार का वर्तमान जीवन और दूसरा आख़िरत का जीवन, जो अभी हमारी दृष्टि से ओझल है। इसलिए मनुष्य की वास्तविक परीक्षा यह है कि वह इस संसार की अपेक्षा आख़िरत को प्राथमिकता दे। किंतु यह केवल वही लोग कर सकते हैं, जिनमें इस संसार में रहते हुए अपनी स्वार्थी इच्छाओं और वासनाओं को नियंत्रित करने का साहस हो।

मनुष्य को वर्तमान संसार में परीक्षा के लिए रखा गया है। इस परीक्षा के लिए अनिवार्य रूप से स्वतंत्रता की आवश्यकता है। यही कारण है कि मनुष्य को ब्रह्मांड के शेष हिस्सों की तरह किसी भी विवशता या मजबूरी के अधीन नहीं रखा गया है। उसके पास विकल्प है कि वह या तो ईश्वर की व्यवस्था का पालन करे या उससे विचलित हो जाए।

लेकिन यह स्वतंत्रता केवल इस दुनिया में उसके जीवनकाल के दौरान किए गए कार्यों पर लागू होती है; यह उसके कार्यों के परिणाम पर लागू नहीं होती। ईश्वर के अपरिवर्तनशील नियम ही मनुष्य का अंतिम भाग्य निर्धारित करेंगे। अपने रिकॉर्ड के आधार पर, मनुष्य स्वयं को शाश्वत स्वर्ग में आनंदपूर्वक रहते हुए पाएगा, अन्यथा वह स्वयं को पूर्ण अभाव और महरूमियत की स्थिति में पाएगा।

Maulana Wahiduddin Khan
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