सबके लिए एक जैसा आदर्श
(Universal Model)
ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण ही इस संसार में मनुष्य के लिए जीवन जीने का सर्वोत्तम तरीक़ा है। और यही समर्पण मृत्यु के बाद के शाश्वत जीवन में उसकी सफलता की भी गारंटी देता है।
मनुष्य स्वयं को एक विशाल ब्रह्मांड में पाता है। यह ब्रह्मांड एक विशाल समाज के समान है। और मनुष्य इस समाज का केवल एक छोटा-सा हिस्सा है। इसलिए मनुष्य को जीवन जीने का वही ढाँचा अपनाना चाहिए, जिसे इस ब्रह्मांड के अन्य सभी घटकों ने व्यवहार में अपनाया हुआ है। यही उसके लिए सही और स्वाभाविक मार्ग है। इसी पद्धति में मनुष्य की सफलता का रहस्य छिपा हुआ है।
यह सार्वभौमिक आदर्श क्या है? विशाल अंतरिक्ष में फैले हुए तारों और ग्रहों को देखिए। प्रत्येक तारा और प्रत्येक ग्रह अपनी कक्षा (orbit) में अत्यंत सटीकता के साथ गति करता है। उनमें से कोई भी दूसरे की कक्षा में प्रवेश नहीं करता। इसी अनुशासन के कारण पूरे ब्रह्मांड में शांति बनी रहती है। ईश्वर चाहता है कि मनुष्य भी समाज में रहते हुए और दूसरों के साथ व्यवहार करते समय इसी बिना-हस्तक्षेप (non-interference) की नीति को अपनाए। हर व्यक्ति को यह जानना चाहिए कि उसकी स्वतंत्रता वहीं समाप्त हो जाती है, जहाँ से दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता आरंभ होती है।
पेड़ों की दुनिया पर विचार कीजिए। पेड़ों ने मौन रूप से दूसरों की सेवा पर आधारित एक सुंदर व्यवस्था अपना रखी है। वे अन्य जीवों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ऑक्सीजन प्रदान करते हैं और उन जीवों द्वारा छोड़ी गई अवांछनीय कार्बन डाइऑक्साइड को अपने भीतर समाहित कर लेते हैं। यह एक निःस्वार्थ, उपकार करने वाली व्यवस्था है। मनुष्य के लिए भी यह अनिवार्य है कि वह अपने जीवन में इसी व्यवस्था को अपनाए।
इसी तरह, पर्वतीय झरनों के बारे में सोचें, जिनका पानी फूटकर निकलता है और तेज़ी से आगे बहता है। उन्हें बार-बार विशाल चट्टानों का सामना करना पड़ता है जो उनकी यात्रा में बाधा की तरह दिखाई देती हैं। हालाँकि, झरने आगे बढ़ने के लिए चट्टानों को अपने रास्ते से हटाने की कोशिश नहीं करते हैं। इसके बजाय, वे एक बिना-टकराव (non-confrontational) वाला मार्ग अपनाते हैं। वे चट्टानों के चारों ओर घूमकर रास्ता बनाते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। यह, मानो मनुष्य के लिए एक संदेश है कि वह जीवन में आने वाली बाधाओं से टकराने से बचे। सही दृष्टिकोण यह है कि चतुराई के साथ उनसे बचकर निकल जाएं और इस तरह सकारात्मक कार्यों में लगे रहने में सक्षम हों।
इसी तरह, पशुओं की दुनिया में हम देखते हैं कि उनके बीच बार-बार ऐसे मुद्दे उठते हैं जो उनके बीच संघर्ष का कारण बनते हैं। हालाँकि, आम तौर पर, वे थोड़ी देर के लिए दहाड़ते और गुर्राते हैं या अपने सींग हिलाते हैं, और फिर वे उस मुद्दे को भूल जाते हैं और जल्दी ही सामान्य स्थिति में लौट आते हैं जैसे कि कुछ हुआ ही न हो। मनुष्य को भी समाज में इसी तरह रहना चाहिए। सामाजिक जीवन में, बार-बार ऐसी चीजें होती हैं जो लोगों को परेशान करती हैं। इससे निपटने का सही तरीक़ा इन स्थितियों को अस्थायी रूप से स्वीकार करना है। व्यक्ति को उन्हें स्थायी कड़वाहट का रूप नहीं लेने देना चाहिए।
प्रकृति की दुनिया का अध्ययन हमें बताता है कि हर चीज़ दूसरों को देती है, बिना किसी बदले की माँग किए। उदाहरण के लिए, सूर्य हमें उदारतापूर्वक प्रकाश देता है, किंतु उसका कोई मूल्य नहीं वसूल करता। हवा निरंतर हमें ऑक्सीजन प्रदान करती है, परंतु वह कोई मुआवज़ा नहीं लेती। इसी तरह, कई जीव और वस्तुएं बिना किसी प्रतिफल के लोगों की सेवा में लगे हुए हैं। उनमें से कोई भी उनसे लाभ उठाने वालों के सामने कोई बिल प्रस्तुत नहीं करता। इससे यह शिक्षा मिलती है कि हमारे चारों ओर की दुनिया एक देने वाली दुनिया है। मानो इस संसार की संस्कृति ही देने की संस्कृति हो। इस संसार की हर वस्तु निरंतर यह संदेश देती है—सिर्फ़ लेने वाले मत बनो, बल्कि दूसरों को देने वाले बनो।
मनुष्य को अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में इसी देने की संस्कृति को अपनाना चाहिए। उसके चारों ओर का ब्रह्मांड इस विषय में उसके लिए एक आदर्श नमूना है। इसी आदर्श को अपनाने में मनुष्य की सफलता का रहस्य छिपा हुआ है। अंतर केवल इतना है कि शेष सृष्टि में यह समर्पण प्राकृतिक नियमों के अंतर्गत अनिवार्य रूप से स्थापित है, जबकि मनुष्य को इस सार्वभौमिक समर्पण के आदर्श को अपनी स्वतंत्र इच्छा से, सचेत रूप में अपनाना होता है।
अपनी स्वतंत्र इच्छा को इस सार्वभौमिक अनुशासन के अधीन करना, मानो स्वतंत्र होते हुए भी स्वयं को “अस्वतंत्र” बना लेना है। यही समर्पण मनुष्य के लिए जीवन जीने का सर्वोत्तम मार्ग है। और यही समर्पण मृत्यु के बाद के शाश्वत जीवन में उसकी सफलता की भी गारंटी देता है।
