व्यक्तित्व का विकास
मनुष्य के मस्तिष्क में प्रतिदिन जो विचार आते हैं, वही उसके चरित्र का निर्माण करते हैं। सकारात्मक विचार एक सकारात्मक व्यक्तित्व बनाते हैं। नकारात्मक विचार एक नकारात्मक व्यक्तित्व बनाते हैं।
अनुभव बताता है कि शिशु अवस्था में मनुष्य मासूमियत का प्रतीक होता है। लेकिन वर्षों के बीतने के साथ, उसके व्यक्तित्व में विभिन्न प्रकार की बुराइयाँ और विकृतियाँ घर कर लेती हैं और उसके चरित्र का हिस्सा बन जाती हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि कोई अपने व्यक्तित्व या चरित्र को कैसे विकसित कर सकता है।
व्यक्तित्व या चरित्र का विकास वास्तव में उसी स्वाभाविक चरित्र को सुरक्षित रखना है, जिसके साथ मनुष्य पैदा हुआ था। व्यक्ति का प्रयास यह होना चाहिए कि समय के साथ उसके चरित्र पर जो बनावटी परदे पड़ गए हैं, उन्हें हटाता रहे, ताकि उसकी वास्तविक और निर्मल प्रकृति फिर से प्रकट हो सके। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। लोहा एक शुद्ध धातु है, लेकिन पानी के संपर्क में आने से उस पर ज़ंग लग जाती है। यह ज़ंग केवल एक बाहरी परत होती है। यदि उसे रगड़ कर साफ कर दिया जाए, तो लोहा अपनी मूल अवस्था में फिर प्रकट हो जाता है।
यह प्रक्रिया प्रतीकात्मक रूप से एक मनोवैज्ञानिक सत्य की ओर संकेत करती है। कोई व्यक्ति कोई बुरा काम करता है और फिर तुरंत उसका एहसास कर लेता है। वह तौबा (क्षमा-याचना) करता है और उसका दिल साफ़ हो जाता है। लेकिन यदि वह लगातार एक के बाद एक बुराई करता चला जाए और न आत्मचिंतन करे, न क्षमा माँगे, तो पाप का प्रभाव उसके दिल से नहीं मिटता। परिणामस्वरूप वह धीरे-धीरे एक संवेदनहीन व्यक्ति बन जाता है। वह बुराई में जीने लगता है और फिर कोई भलाई उसे ऊपर उठाने या संतुलित करने वाली नहीं रहती।
आधुनिक मनोवैज्ञानिक अध्ययनों ने इस बात को और स्पष्ट कर दिया है। मनुष्य के मस्तिष्क के तीन प्रमुख हिस्से होते हैं, जो जन्म से ही मौजूद होते हैं—चेतन मन, अवचेतन मस्तिष्क और अचेतन मन। जब भी कोई विचार मस्तिष्क में प्रवेश करता है, वह सदा के लिए उसका हिस्सा बन जाता है। और जैसा कि हम जानते हैं, मस्तिष्क ही व्यक्तित्व का दूसरा नाम है। इसका अर्थ यह है कि जो विचार मस्तिष्क में प्रवेश करता है, वह सदा के लिए व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है। इसलिए बाद में उसे पूरी तरह निकाल देना संभव नहीं रहता।
जब भी कोई विचार—सकारात्मक या नकारात्मक—मन में आता है, तो वह पहले चेतन मन, अर्थात् जीवित स्मृति में प्रवेश करता है। इसके बाद, जब व्यक्ति रात को सोता है, तो एक स्वाभाविक प्रक्रिया के अंतर्गत वह विचार चेतन मस्तिष्क से निकलकर अवचेतन मस्तिष्क में चला जाता है। इस चरण में मनुष्य का उस विचार पर केवल पचास प्रतिशत नियंत्रण होता है। शेष पचास प्रतिशत उसके नियंत्रण से बाहर होता है। फिर जब वह अगली रात सोता है, तो वह विचार आगे बढ़कर अचेतन मस्तिष्क में प्रवेश कर जाता है। जब ऐसा हो जाता है, तो वह विचार पूरी तरह मनुष्य के सचेत नियंत्रण से बाहर हो जाता है।
मनुष्य के मस्तिष्क में प्रतिदिन आने वाले विचार ही उसके चरित्र का निर्माण करते हैं। जैसे विचार होंगे, वैसा ही व्यक्तित्व होगा। सकारात्मक विचार एक सकारात्मक व्यक्तित्व बनाते हैं। इसके विपरीत, यदि विचार नकारात्मक हों, तो चरित्र लगातार अधिक से अधिक नकारात्मक होता चला जाएगा।
आजकल बहुत से लोग नकारात्मक सोच में डूबे हुए हैं। कोई व्यक्ति ऊपर से सकारात्मक बातें करता हुआ दिखाई दे सकता है, लेकिन यदि आप उससे अधिक बातचीत करें और उसके व्यक्तित्व को समझने का प्रयास करें, तो आपको पता चलेगा कि वह भी अधिकांश लोगों की तरह नकारात्मक है। अधिकतर लोग नकारात्मकता के क़ब्रिस्तान में जी रहे हैं, जबकि उन्हें इसका एहसास भी नहीं है। इस मामले में ‘धार्मिक’ और ‘ग़ैर-धार्मिक’ लोगों में प्रायः कोई अंतर नहीं होता।
सबसे बुरा चरित्र नकारात्मक चरित्र होता है और सबसे उत्तम चरित्र सकारात्मक चरित्र होता है। इसलिए प्रश्न यह है कि सकारात्मक व्यक्तित्व का विकास कैसे किया जाए। सही तरीका यह है कि जैसे ही कोई नकारात्मक विचार मस्तिष्क में आए, उसे तुरंत समाप्त कर दिया जाए। फिर एक विशेष पद्धति से उस नकारात्मक विचार को सकारात्मक में बदल दिया जाए। उदाहरण के लिए, यदि आपको किसी पर क्रोध आ जाए, तो तुरंत उसे क्षमा कर दें, ताकि क्रोध प्रतिशोध का रूप न ले और आपका चरित्र क्रोध और घृणा जैसी नकारात्मक विशेषताओं से सुरक्षित रह सके। यदि आपको किसी की सफलता पर ईर्ष्या होने लगे, तो उसके लिए दुआ और उसकी भलाई की कामना करें। इस प्रकार ईर्ष्या आपके चरित्र में प्रवेश नहीं करेगी।
हमें जो करना चाहिए वह यह है कि जैसे ही कोई नकारात्मक विचार (Negative Thought) मस्तिष्क में आए, उसे तुरंत सकारात्मक (Positive) विचार में बदल देना चाहिए। यदि इसमें देरी होती है, तो नकारात्मक सोच बहुत तेज़ी से हमारे अवचेतन मस्तिष्क (Subconscious Mind) में और कुछ समय बाद अचेतन मस्तिष्क (Unconscious Mind) में प्रवेश कर जाती है।
हालाँकि, बहुत कम लोग नकारात्मक विचारों को सकारात्मक विचारों में बदल पाते हैं। इस कारण उन्हें एक मुर्दा और नकारात्मक व्यक्तित्व के बोझ तले दबने की भयानक क़ीमत चुकानी पड़ती है। नकारात्मक व्यक्तित्व एक जहन्नमी व्यक्तित्व है और सकारात्मक व्यक्तित्व एक जन्नती व्यक्तित्व है। यदि आप खुद को इस विनाशकारी स्थिति से बचाना चाहते हैं, तो ऊपर बताए गए आंतरिक सुधार और सफाई (Cleansing) के तरीक़े का अभ्यास करें और इसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएँ। केवल तभी आप एक सकारात्मक व्यक्तित्व विकसित करना जारी रख सकते हैं। इस समस्या का इसके अलावा और कोई समाधान नहीं है।
